एकला चलो रे..!

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शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

याद तो आती ही है..क्यों नही आयेगी याद जादूगर की



याद तो आती ही है..क्यों नही आयेगी याद जादूगर की जिसने साधारण ढंग से असाधारण रचा हो..क्यों नही याद आयेगी उसकी जिसने लगभग नंगे रहकर सबको खादी पहनाना चाहा हो..मन नही भूल सकता उसे जिसने उपवास रखा हो बार-बार कि बाकी कोई भूखा ना हो, जिसने सदाग्रह रखा हो राम से कि फिर-फिर नोआखाली ना हो..हर समय याद आयेगी उस बूढ़े की हमें, क्योंकि घड़ी हमेशा उसके साथ रही..क्षण-क्षण की नब्ज पे पकड़ थी उस फ़कीर की...याद तो आयेगी ही ना उसकी कि उसने खुद साफ़ किये कितने ही कोलोनियों के पाखाने, ताकि तन के साथ मन साफ़ रहे लोगों के....पर.....बाध्य हूँ मै...इन बिन्दुओं में ही शायद कुछ कह पाऊं..क्योंकि हर हालात का जिम्मेदार मै भी तो हूँ..........!!!
अभिनव उपाध्याय से भी रहा ना गया...अपना भोलापन छिपा ना सके..यहाँ वे गाँधी जी को ठीक वैसे याद कर रहे हैं जैसे शास्त्री जी , इस अभागे समय में महात्मा को याद करते.....! 
देश की सरकार ने देश भर में "अवकाश" जो दे दिया है..! याद तो आयेगी ही...पर महत्वपूर्ण यही है कि कैसे याद किये जा रहे बापू...आइये देखते हैं..!  --
श्रीश पाठक

       




गांधी। फिर एक बार तुम याद आए।  सबको। सच। मंत्री। प्रधानमंत्री। गृहमंत्री। सबने किया तुम्हे याद। और तो और। भोंपू बजाने वाली। मीडिया को भी। राम नाम। सबने बजाया। बापू। सबने गाया। तुम्हारा गीत। लेकिन। आज के भारत की। कुछ और ही रीति। कि। जब जब हम होते। अधीर। मसले हों जब गंभीर। हम तभी याद करते। हम खोज लेते हैं। अपना फायदा। नाम में। काम में। इस्तेमाल हम जानते हैं। बखूबी। तुम्हारे लिए। राम तो राम है। उतना ही प्यारा। जितना अल्लाह। महात्मा। तुम तो ठीक थे। हमारा राम। हो गया दूसरा। तुम्हारा राम। वनवास से आया था। लेकिन हमने दिया। लम्बा वनवास। राम तुम आओ। अल्लाह बन कर। चाहे गॉड बन कर। हमे जरूरत है। बापू। हमें शक्ति दो। कि हम केवल गांए नहीं। निभाएं। हों मजबूत। संमति दो। विवेक दो। मन हो। अहिंसक। पावन। सरल। सहज..!
(चित्र साभार : गूगल ईमेज ) 

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

राष्ट्रपिता को नमन।

shyam1950 ने कहा…

कहा था मैंने
मत बुलाओ उसे

चमकीले
चमत्कारी खिलोनों से
भर देगा तुम्हारा घर
तुम्हें बेघर करके
थमा देगा नशे का लालीपाप

छीन लेगा तुम्हारा
पुंसत्व
जिजीवषा और स्वत्व

वही हुआ और
यह रहा तुम्हारा आज

कहा था मैंने
चरखा भी इक बेहतर साथी है
धोती चादर से भी ढंका जाता है तन
कि अपना ही मन
गुलामी का प्रवेश द्वार होता है

कि पहिया
पाँव का विकल्प नहीं और
निर्भरता हर हाल में पाप

पर अपनी धुन में
कुछ भी तो नहीं
सुन पाए तुम !

अब यह लो
यह रहा तुम्हारा आज

श्याम जुनेजा